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पद — सूरदास: नोट्स

7 sections 7 min readBeta

1. कवि-परिचय: सूरदास

ध्यान दें: सूरदास के चारों पद अपनी पाठ्यपुस्तक क्षितिज भाग 2 (NCERT) में अवश्य पढ़ें, हो सके तो गाकर। यहाँ केवल SOYL की व्याख्या है; पदों की कोई पंक्ति यहाँ नहीं दी गई है।

सूरदास (लगभग 1478–1583) हिंदी भक्तिकाल की सगुण धारा की कृष्णभक्ति शाखा के सबसे प्रसिद्ध कवि हैं। उनके जन्म-स्थान के विषय में दो मत हैं — रुनकता (आगरा-मथुरा क्षेत्र) और सीही (दिल्ली के पास)। वे महाप्रभु वल्लभाचार्य के शिष्य थे और उनके पुष्टिमार्ग से जुड़े; वल्लभ संप्रदाय के आठ कवियों के समूह अष्टछाप में वे सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं। उनकी रचनाएँ सूरसागर, साहित्य लहरी और सूर सारावली मानी जाती हैं, जिनमें सूरसागर सबसे लोकप्रिय है। कृष्ण की बाल-लीलाओं (वात्सल्य) और प्रेम के संयोग-वियोग (शृंगार) के चित्रण में सूर का स्थान सर्वोच्च माना जाता है। उनके पद ब्रजभाषा में और गाए जाने के लिए रचे गए हैं। उनका निधन पारसौली में माना जाता है।

तालिका: सूरदास — जीवन-काल लगभग चौदह सौ अठहत्तर से पंद्रह सौ तिरासी, जन्म-स्थान के दो मत, गुरु वल्लभाचार्य, कृष्णभक्ति शाखा, रचनाएँ सूरसागर, साहित्य लहरी, सूर सारावली।
बिंदुजानकारी
जीवन-काललगभग सन् 1478 – 1583
जन्म-स्थान (दो मत)रुनकता (आगरा-मथुरा क्षेत्र) अथवा सीही (दिल्ली के पास)
गुरु और संप्रदायमहाप्रभु वल्लभाचार्य; पुष्टिमार्ग; अष्टछाप के सबसे प्रसिद्ध कवि
काव्यधाराभक्तिकाल, सगुण भक्ति, कृष्णभक्ति शाखा
रचनाएँसूरसागर (सर्वाधिक प्रसिद्ध), साहित्य लहरी, सूर सारावली
विशेष पहचानवात्सल्य और शृंगार (संयोग-वियोग) के चित्रण में सर्वोच्च; ब्रजभाषा; गेय पद

मुख्य शब्द

अष्टछाप

वल्लभ संप्रदाय के आठ कृष्णभक्त कवियों का समूह।

पुष्टिमार्ग

वल्लभाचार्य द्वारा प्रवर्तित भक्ति-संप्रदाय, जिसमें ईश्वर की कृपा (पुष्टि) प्रधान है।

2. प्रसंग: भ्रमरगीत

मथुरा जाने के बाद कृष्ण ब्रज नहीं लौटे। उन्होंने अपने ज्ञानी मित्र उद्धव को गोपियों के पास भेजा। उद्धव योग और निर्गुण ब्रह्म का उपदेश देकर गोपियों का वियोग-दुख कम करना चाहते थे। प्रेम-मार्ग पर चलने वाली गोपियों को यह नीरस उपदेश स्वीकार नहीं था। उसी समय वहाँ एक भौंरा (भ्रमर, मधुकर) आ गया; गोपियाँ उसी को संबोधित करते हुए उद्धव पर व्यंग्य और उलाहने की बौछार करती हैं। इसलिए यह प्रसंग भ्रमरगीत कहलाता है। पाठ्यपुस्तक के चारों पद इसी प्रसंग से हैं।

तालिका: पदों के पात्र — गोपियाँ, उद्धव, कृष्ण और भ्रमर — और उनकी भूमिका।
पात्रकौनपदों में भूमिका
गोपियाँब्रज की ग्वालिनेंकृष्ण की अनन्य प्रेमिकाएँ; व्यंग्य और उलाहने से उत्तर देने वाली
उद्धवकृष्ण के ज्ञानी मित्रयोग और निर्गुण ब्रह्म का संदेश लाने वाले
कृष्णमथुरा के शासक बन चुकेजिनके वियोग में गोपियाँ हैं; अंत में आरोप उन्हीं पर
भ्रमर (मधुकर)एक भौंराजिसे संबोधित कर गोपियाँ उद्धव पर व्यंग्य करती हैं

3. चारों पदों का भाव (विचार के अनुसार, SOYL के शब्दों में)

(क) व्यंग्य: "भाग्यशाली" उद्धव (पहला पद). गोपियाँ उद्धव को भाग्यशाली कहती हैं, क्योंकि कृष्ण के पास रहकर भी वे प्रेम से अछूते रहे — जैसे पानी में रहकर भी सूखा रहने वाला कमल का पत्ता या तेल से चुपड़ा घड़ा। यह प्रशंसा वास्तव में उलाहना है। अपनी दशा के लिए गोपियाँ गुड़ से चिपकी चींटी का चित्र रखती हैं — प्रेम की मिठास और उससे छूट न पाने की विवशता।

(ख) टूटी आशा, बढ़ा विरह (दूसरा पद). वियोग में गोपियों का सहारा कृष्ण के लौटने का विश्वास था। योग-संदेश ने इसी विश्वास पर चोट की; इसलिए सांत्वना के बजाय विरह बढ़ा। अपनी पीड़ा बाँटने वाला कोई नहीं; जहाँ से सहारे की आशा थी, वहीं से आघात मिला। अंत में गोपियाँ कृष्ण पर प्रेम की मर्यादा न निभाने का आरोप लगाती हैं।

(ग) अनन्य निष्ठा, योग से अरुचि (तीसरा पद). हारिल पक्षी जैसे अपनी लकड़ी नहीं छोड़ता, वैसे ही गोपियों ने कृष्ण का सहारा पकड़ रखा है; हर समय, हर अवस्था में वे कृष्ण को याद करती हैं। योग उन्हें कड़वी ककड़ी जैसा और एक अनजाने रोग जैसा लगता है। व्यंग्य भरी सलाह: योग उन्हें दो जिनका मन किसी चकरी की तरह डोलता है।

(घ) राजनीति और राजधर्म (चौथा पद). गोपियों को लगता है कि कृष्ण ने मथुरा में राजनीति सीख ली है; प्रेम के बदले योग भेजना उनकी चाल है। वे कृष्ण की न्यायप्रियता को ही उनके विरुद्ध तर्क बनाती हैं, व्यंग्य से अपना मन लौटा लेने की बात करती हैं और राजा का धर्म बताती हैं — प्रजा के हित की रक्षा करना, उसे कष्ट न देना।

यह SOYL का भावार्थ है, पदों का अनुवाद नहीं। मूल पद अपनी पाठ्यपुस्तक में पढ़ें।

पद की पंक्तियाँ अपनी पाठ्यपुस्तक में पढ़ें; यहाँ केवल चित्रों का अर्थ है।
चित्र (SOYL के शब्दों में)किस परभाव
पानी में रहकर भी सूखा कमल का पत्ताउद्धवपास रहकर भी अप्रभावित — अलिप्तता
पानी में डूबा, पर तेल से चुपड़ा घड़ाउद्धवप्रेम की एक बूँद भी नहीं ठहरती
गुड़ से चिपकी चींटीगोपियाँप्रेम की मिठास और उससे छूट न पाने की विवशता
तालिका: तीसरे पद के चित्र SOYL के शब्दों में — हारिल पक्षी, निरंतर स्मरण, कड़वी ककड़ी, अनजाना रोग और चकरी जैसा मन — और उनके भाव।
चित्र (SOYL के शब्दों में)भाव
पंजों में पकड़ी लकड़ी न छोड़ने वाला हारिल पक्षीकृष्ण गोपियों का अटल सहारा — अनन्य निष्ठा
हर समय, हर अवस्था में कृष्ण का स्मरणप्रेम की निरंतरता
कड़वी ककड़ीयोग-संदेश गोपियों को अप्रिय
अनजाना रोगयोग गोपियों के लिए उपचार नहीं, कष्ट है
चकरी की तरह घूमता मनयोग चंचल मन वालों के लिए है, गोपियों के लिए नहीं

4. गोपियों का चरित्र और उनकी युक्तियाँ

गोपियाँ: कृष्ण की अनन्य प्रेमिकाएँ; भोली दिखने वाली, पर वाक्पटु; स्वाभिमानी (योग ठुकराती हैं); जागरूक (राजधर्म की बात करती हैं)।

वाग्विदग्धता की युक्तियाँ: वक्रोक्ति (प्रशंसा में उलाहना), लोक-जीवन के उदाहरण (कमल, चींटी, हारिल, ककड़ी), उपदेश को उलटकर लौटाना (योग चंचल मन वालों को दो), संदेशवाहक से असली दोषी तक आरोप का मोड़, और निजी उलाहने को सार्वजनिक प्रश्न (राजधर्म) में बदलना।

ज्ञान बनाम प्रेम: उद्धव ज्ञान और योग के प्रतिनिधि हैं, गोपियाँ प्रेम और सगुण भक्ति की। सूर संवाद में जीत गोपियों को देकर प्रेम-मार्ग को श्रेष्ठ ठहराते हैं।

तालिका: गोपियों की पाँच युक्तियाँ — वक्रोक्ति, लोक-जीवन के उदाहरण, उपदेश को उलटना, आरोप का मोड़ और राजधर्म का प्रश्न।
गोपियों की युक्तिकैसेप्रभाव
वक्रोक्तिउद्धव को भाग्यशाली कहनाप्रशंसा में छिपा उलाहना
लोक-जीवन के उदाहरणकमल, चींटी, हारिल, ककड़ीतर्क सहज और अकाट्य
उपदेश को उलट देनायोग चंचल मन वालों को दोउद्धव का संदेश ही व्यर्थ
आरोप का मोड़कृष्ण पर मर्यादा तोड़ने का आरोपसंदेशवाहक से असली दोषी तक
सार्वजनिक प्रश्नराजधर्म की कसौटीनिजी उलाहना नीति का प्रश्न बनता है

5. काव्य-सौंदर्य: भाषा, रस, शैली

  • भाषा: कोमल, मधुर ब्रजभाषा; माधुर्य गुण।
  • रस: वियोग (विप्रलंभ) शृंगार।
  • शैली: पद-शैली — गेय, लयात्मक, संगीतात्मक; संवाद और वक्रोक्ति।
  • उपमान: लोक-जीवन से — कमल का पत्ता, तेल से चुपड़ा घड़ा, चींटी और गुड़, हारिल पक्षी, कड़वी ककड़ी, चकरी।
  • स्वर: व्यंग्य, उलाहना और पीड़ा का मेल।
तालिका: काव्य-सौंदर्य के चार पक्ष — भाषा ब्रजभाषा, रस वियोग शृंगार, शैली गेय पद और लोक-जीवन के उपमान।
पक्षविशेषता
भाषाकोमल, मधुर ब्रजभाषा; माधुर्य गुण
रसवियोग (विप्रलंभ) शृंगार
शैलीपद-शैली, गेयता, संवाद और वक्रोक्ति
उपमानग्रामीण, लोक-जीवन से: कमल, चींटी, हारिल, ककड़ी, चकरी

6. अलंकार (SOYL की उदाहरण-पंक्तियों से)

परीक्षा में अलंकार पहचानने के लिए नियम याद रखिए। उदाहरण-पंक्तियाँ SOYL की रची हैं; पदों में प्रयोग का केवल वर्णन दिया गया है।

  • रूपक — उपमेय और उपमान में अभेद: "आस-दीप मन-मंदिर में जलता रहा रात भर" (SOYL)। पदों में: प्रेम को नदी ही मान लेना।
  • उपमा — समानता, वाचक शब्द के साथ: "बरखा-सी बरसीं अँखियाँ" (SOYL)। पदों में: गोपियों की तुलना गुड़ से चिपकी चींटी से, योग की कड़वी ककड़ी से।
  • अनुप्रास — एक वर्ण की आवृत्ति: "मधुर मुरलिया मोहे मन" (SOYL)।
  • पुनरुक्ति प्रकाश — एक शब्द की पुनरावृत्ति: "घड़ी-घड़ी, पल-पल राह निहारें नैना" (SOYL)। पदों में: कृष्ण के नाम की बार-बार रट।
  • वक्रोक्ति — कहना कुछ, अर्थ कुछ और: धन्य तुम्हारा ज्ञान, सखा, जो प्रेम न पहचाने (SOYL)। पदों में: उद्धव को भाग्यशाली कहना।
उदाहरण-पंक्तियाँ SOYL की रची हुई हैं, सूरदास की नहीं।
अलंकारपहचानSOYL की उदाहरण-पंक्तिपदों में (वर्णन)
रूपकउपमेय और उपमान में अभेदआस-दीप मन-मंदिर में जलता रहा रात भरप्रेम को नदी ही मान लेना
उपमासमानता; सा, सी, जैसा आदिबरखा-सी बरसीं अँखियाँ, सूनी भई अटारीगुड़ से चिपकी चींटी, कड़वी ककड़ी से तुलना
अनुप्रासएक वर्ण की आवृत्तिमधुर मुरलिया मोहे मनविरह-वर्णन में एक ही वर्ण का बार-बार आना
पुनरुक्ति प्रकाशएक शब्द की पुनरावृत्तिघड़ी-घड़ी, पल-पल राह निहारें नैनाकृष्ण के नाम की बार-बार रट
वक्रोक्तिकहना कुछ, अर्थ कुछ औरधन्य तुम्हारा ज्ञान, सखा, जो प्रेम न पहचानेउद्धव को भाग्यशाली कहना

7. परीक्षा में पठित काव्यांश और शब्दार्थ

बोर्ड परीक्षा में पाठ्यपुस्तक से एक काव्यांश देकर पाँच बहुविकल्पी प्रश्न पूछे जाते हैं। SOYL अपनी सामग्री में पदों की पंक्तियाँ नहीं छापता; अभ्यास के लिए SOYL की टिप्पणियाँ (किसी पद के भाव की व्याख्या) दी गई हैं, जिन पर वैसे ही प्रश्न हैं।

असली तैयारी: क्षितिज भाग 2 में चारों पद बार-बार पढ़िए, हर पद का केंद्रीय भाव और उसके चित्र पहचानिए, और कठिन शब्दों के अर्थ (नीचे) याद कीजिए। प्रश्न हल करते समय उत्तर काव्यांश में खोजिए; "भाग्यशाली" जैसे शब्दों का व्यंग्यार्थ अवश्य देखिए।

केवल एक-एक शब्द दिया गया है; पंक्तियाँ अपनी पाठ्यपुस्तक में पढ़ें।
शब्दअर्थ
बड़भागीभाग्यशाली (यहाँ व्यंग्य में)
अपरसअछूता, अलिप्त
हारिलएक पक्षी जो पंजों में लकड़ी पकड़े रहता है
चकरीघूमने वाला खिलौना; चंचलता
मधुकरभौंरा (यहाँ उद्धव पर व्यंग्य)
व्याधिरोग
मरजादामर्यादा, प्रतिष्ठा, नियम

मुख्य शब्द

बड़भागी

भाग्यशाली (पद में व्यंग्य से)

अपरस

अछूता, अलिप्त

हारिल

एक पक्षी जो पंजों में लकड़ी पकड़े रहता है

चकरी

घूमने वाला खिलौना; चंचलता

मधुकर

भौंरा

व्याधि

रोग

मरजादा

मर्यादा

परीक्षा सुझाव

खंड ग, क्षितिज काव्य — 11 अंक: पठित काव्यांश पर 5 बहुविकल्पी प्रश्न (5 × 1) और काव्य पाठों पर 4 में से 3 प्रश्न (25–30 शब्द, 3 × 2)।

अंक कैसे मिलते हैं (2 अंक): भाव/तथ्य (1) + पद का प्रसंग या चित्र, अपने शब्दों में (1)।

आम गलतियाँ

  1. उद्धव को सगुण भक्त लिखना — वे निर्गुण और योग के ज्ञानी थे।
  2. "भाग्यशाली" को सच्ची प्रशंसा मानना — यह व्यंग्य है।
  3. पदों की भाषा अवधी या खड़ी बोली लिखना — ब्रजभाषा।
  4. रस वात्सल्य लिखना — इन पदों में वियोग शृंगार है।
  5. राजधर्म की बात उद्धव से जोड़ना — यह कृष्ण के लिए कही गई है।
  6. पंक्तियाँ रटकर गलत उद्धृत करना — चित्र का नाम और भाव अपने शब्दों में लिखना पर्याप्त है।