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एक कहानी यह भी — मन्नू भंडारी: नोट्स

7 sections 7 min readBeta

1. लेखिका-परिचय: मन्नू भंडारी

ध्यान दें: मूल पाठ अपनी पाठ्यपुस्तक क्षितिज भाग 2 (NCERT) में अवश्य पढ़ें। यहाँ केवल SOYL की व्याख्या है, पाठ नहीं।

मन्नू भंडारी (1931–2021) का जन्म भानपुरा गाँव (ज़िला मंदसौर, मध्य प्रदेश) में हुआ। उनका बचपन और कॉलेज तक की पढ़ाई राजस्थान के अजमेर में हुई; बाद में उन्होंने हिंदी में एम.ए. किया और दिल्ली के मिरांडा हाउस कॉलेज में पढ़ाया। वे हिंदी की नई कहानी धारा की प्रमुख कथाकार हैं; उनकी रचनाओं में स्त्री-मन, परिवार और समाज का यथार्थ सहजता से उभरता है।

  • कहानी-संग्रह: एक प्लेट सैलाब, मैं हार गई, यही सच है, त्रिशंकु;
  • उपन्यास: आपका बंटी (अलग हो चुके माता-पिता के बच्चे की मनःस्थिति), महाभोज (राजनीति पर)।
तालिका: मन्नू भंडारी — जन्म उन्नीस सौ इकतीस में भानपुरा में, निधन दो हज़ार इक्कीस, पढ़ाई अजमेर में, मिरांडा हाउस में अध्यापन, कहानी-संग्रह, उपन्यास और नई कहानी आंदोलन में पहचान।
बिंदुजानकारी
जन्मसन् 1931, भानपुरा गाँव, ज़िला मंदसौर (मध्य प्रदेश)
निधनसन् 2021
शिक्षा और कार्यआरंभिक और कॉलेज की पढ़ाई अजमेर में; हिंदी में एम.ए.; दिल्ली के मिरांडा हाउस कॉलेज में अध्यापन
कहानी-संग्रहएक प्लेट सैलाब, मैं हार गई, यही सच है, त्रिशंकु
उपन्यासआपका बंटी, महाभोज
पहचाननई कहानी आंदोलन की प्रमुख कथाकार; स्त्री-मन, परिवार और समाज का यथार्थ

मुख्य शब्द

आत्मकथ्य

अपने जीवन के चुने हुए प्रसंगों का स्वयं लेखक द्वारा किया गया वर्णन।

नई कहानी

स्वतंत्रता के बाद की हिंदी कहानी की धारा, जिसमें आम जीवन और मन के यथार्थ पर बल था।

2. विधा और प्रसंग

"एक कहानी यह भी" आत्मकथ्य है। लेखिका ने अपने पूरे जीवन की कथा नहीं, बल्कि सन् 1944 से 1947 के आसपास के वे प्रसंग चुने हैं जिनसे उनका व्यक्तित्व और लेखक-मन बना। स्थान अजमेर है और पृष्ठभूमि में स्वतंत्रता आंदोलन के अंतिम वर्ष हैं। पाठ में पिता और प्राध्यापिका शीला अग्रवाल का व्यक्तित्व विशेष रूप से सामने आता है।

शीर्षक: अनेक कहानियाँ लिखने वाली लेखिका की अपनी जीवन-कहानी भी "एक कहानी" है — "यह भी" शब्द यही संकेत देता है।

तालिका: आत्मकथ्य क्या है और इस पाठ में उसका केंद्र, मुख्य व्यक्ति, पृष्ठभूमि और उद्देश्य।
आत्मकथ्यइस पाठ में
क्या हैअपने जीवन के चुने हुए प्रसंगों का वर्णन, स्वयं लेखक द्वारा
किस पर केंद्रितलेखिका का किशोर-जीवन, सन् 1944 से 1947 के आसपास
मुख्य व्यक्तिपिता, माँ, बहन सुशीला, प्राध्यापिका शीला अग्रवाल
पृष्ठभूमिअजमेर, स्वतंत्रता आंदोलन के अंतिम वर्ष
उद्देश्ययह समझना कि लेखिका का व्यक्तित्व और लेखक-मन कैसे बना

3. पाठ का सार (प्रसंगों के क्रम से, SOYL के शब्दों में)

(क) पिता के दो रूप. इंदौर में पिता संपन्न, सम्मानित, कांग्रेस और समाज-सुधार से जुड़े थे और उनके घर विद्यार्थी रहकर पढ़ते थे — यह लेखिका ने सुना था। अजमेर में बड़े आर्थिक नुकसान के बाद उन्होंने विषयवार अंग्रेज़ी-हिंदी शब्दकोश का काम आगे बढ़ाया, जिससे ख्याति तो मिली पर आमदनी नहीं। तंगी, अहं और अपनों के धोखों ने उन्हें क्रोधी और शक्की बनाया।

(ख) तुलना और हीनता. साँवली, दुबली लेखिका की गोरी बड़ी बहन सुशीला से बार-बार तुलना ने उनके मन में हीनता की गाँठ बना दी, जो प्रसिद्धि के बाद भी नहीं खुली। लेखिका को आज अपने भीतर पिता के शक की झलक भी दिखती है।

(ग) माँ. असीम धैर्य वाली, सब कुछ चुपचाप सहने वाली माँ से बच्चों का लगाव सहानुभूति का था; उनका विवश त्याग लेखिका का आदर्श नहीं बना।

(घ) मोहल्ला. बचपन में पड़ोस परिवार का विस्तार था; वही लोग बाद में लेखिका की शुरुआती कहानियों में पात्र बनकर आए। महानगरों में यह अपनापन खो गया है।

(ङ) पिता का ध्यान. 1944 में सुशीला के विवाह और भाइयों के बाहर जाने के बाद पिता ने लेखिका को रसोई के कामों से अलग रखा और घर की राजनीतिक बहसों में बिठाया।

(च) शीला अग्रवाल. 1945 में कॉलेज की हिंदी प्राध्यापिका शीला अग्रवाल ने लेखिका को चुनकर पढ़ना और बहस करना सिखाया, और 1946–47 में आंदोलन की सक्रिय सहभागी बनाया।

(छ) दो घटनाएँ. कॉलेज के शिकायती पत्र पर पिता क्रोध में गए, पर बेटी का प्रभाव जानकर गर्वित लौटे। एक परिचित की शिकायत पर भड़के, पर डॉ. अंबालाल की प्रशंसा पर गर्व से भर गए। पिता के भीतर महत्त्वाकांक्षा और लोक-लाज का अंतर्विरोध था।

(ज) 1947. मई में शीला अग्रवाल को नोटिस मिला और लेखिका सहित कुछ छात्राओं का प्रवेश रोका गया; विरोध के बाद अगस्त में कक्षाएँ खुलीं। पर इससे बड़ी खुशी थी — 15 अगस्त 1947, देश की स्वतंत्रता।

यह SOYL का सार है, पाठ का अंश नहीं। मूल पाठ अपनी पाठ्यपुस्तक में पढ़ें।

तालिका: पिता के दो रूप — इंदौर में संपन्न, सम्मानित और उदार; अजमेर में आर्थिक तंगी, शब्दकोश से ख्याति पर आमदनी नहीं, और क्रोधी तथा शक्की स्वभाव।
इंदौर (सुना हुआ)अजमेर (देखा हुआ)
आर्थिक स्थितिसंपन्नताबड़े नुकसान के बाद तंगी
सामाजिक जीवनकांग्रेस, समाज-सुधार, सम्मानविषयवार शब्दकोश का काम; ख्याति, पर आमदनी नहीं
स्वभावउदार; उनके घर विद्यार्थी रहकर पढ़ते थेचिड़चिड़े, क्रोधी, अपनों के धोखों से शक्की

4. पात्र-चित्रण और लेखिका-पिता संबंध

पिता: प्रगतिशील (बेटी को रसोई के कामों से अलग रखकर बहसों में बिठाया), परिश्रमी और विद्वान (शब्दकोश), पर क्रोधी, अहंकारी और शक्की; ख्याति की चाह और लोक-लाज के डर का अंतर्विरोध।

माँ: धैर्यवान, त्यागी, सहनशील; पर उनका त्याग विवशता से उपजा, इसलिए लेखिका का आदर्श नहीं बना।

शीला अग्रवाल: प्रेरक, जोशीली शिक्षिका; साहित्य और राजनीति, दोनों में लेखिका की मार्गदर्शक; इसके लिए नोटिस भी झेला।

लेखिका: निर्भीक, स्वाभिमानी, नेतृत्व-क्षमता वाली; पर भीतर बचपन की हीनता; ईमानदार आत्म-विश्लेषक।

लेखिका और पिता का संबंध: टकराव पीढ़ियों से अधिक विचारों का — पिता घर के भीतर की जागरूकता तक की छूट देते थे, लेखिका अपने निर्णय स्वयं लेना चाहती थीं। फिर भी पिता के कई गुण-दोष लेखिका के व्यक्तित्व में घुले हैं।

तालिका: लेखिका पर पिता, माँ, सुशीला, शीला अग्रवाल और मोहल्ले का प्रभाव।
व्यक्तिलेखिका पर प्रभाव (SOYL के शब्दों में)
पिताराजनीतिक जागरूकता, रसोई के कामों से अलग रखना; पर तुलना से हीनता और टकराव भी
माँत्याग और धैर्य का सम्मान; पर उनका जीवन आदर्श नहीं
सुशीलाबार-बार तुलना का कारण
शीला अग्रवालचुनकर पढ़ना, बहस, आंदोलन में सक्रियता
मोहल्लाअपनापन; शुरुआती कहानियों में पात्र
तालिका: दो घटनाएँ — प्रिंसिपल का पत्र और परिचित की शिकायत — उनकी शुरुआत, मोड़, परिणाम और निष्कर्ष कि पिता के निर्णय समाज की राय से तय होते थे।
प्रिंसिपल का पत्रपरिचित की शिकायत
शुरुआतपिता क्रोध और बदनामी के डर मेंपिता का क्रोध भड़का, बाहर जाने पर रोक की ठानी
मोड़पता चला कि पूरा कॉलेज बेटी की आवाज़ पर चलता हैडॉ. अंबालाल ने बेटी के भाषण की खुलकर प्रशंसा की
परिणामपिता गर्वित, बेटी हैरानपिता का क्रोध गर्व में बदला
निष्कर्षनिर्णय समाज की राय से तयनिर्णय समाज की राय से तय

मुख्य शब्द

अंतर्विरोध

एक ही व्यक्ति के भीतर परस्पर विरोधी विचार या इच्छाएँ।

लोक-लाज

समाज में बदनामी का डर।

5. मूल भाव और संदेश

  • व्यक्तित्व का निर्माण: परिवार, शिक्षक, पड़ोस और समय — सबका प्रभाव व्यक्ति को गढ़ता है; कुछ हम अपनाते हैं, कुछ के विरुद्ध खड़े होते हैं।
  • तुलना का घाव: बच्चों की तुलना उनके आत्मविश्वास को लंबे समय तक चोट पहुँचा सकती है।
  • अच्छे शिक्षक की भूमिका: सही पुस्तकें और सही प्रेरणा जीवन की दिशा बदल सकती हैं।
  • स्त्री की स्वतंत्रता: लेखिका माँ की तरह चुपचाप सहने के बजाय अपने निर्णय स्वयं लेना चुनती हैं।
  • स्वतंत्रता आंदोलन: छोटे शहर की युवा पीढ़ी, लड़कियाँ भी, उसमें सक्रिय थीं।
तालिका: लेखिका के बचपन का मोहल्ला परिवार जैसा था, जबकि आज के महानगरों में परिवार अपने दरवाज़ों तक सीमित हैं; पहले अपनापन और सुरक्षा, अब अकेलापन।
लेखिका का बचपन (अजमेर)आज के महानगर
पड़ोसपरिवार का विस्तार; हर घर अपनाहर परिवार अपने दरवाज़े के भीतर
बच्चेहर घर में बेरोकटोक आना-जानासीमित मेल-जोल
परिणामअपनापन, सुरक्षा; कहानियों के पात्र यहीं सेअकेलापन और असुरक्षा (लेखिका की दृष्टि में)

6. भाषा-शैली

  • आत्म-विश्लेषणात्मक, ईमानदार शैली: अपनी हीनता, माँ से असहमति और पिता के अंतर्विरोध खुलकर कहना।
  • संस्मरणात्मक चित्र: मोहल्ला, घर की बहसें, कॉलेज और शहर का चौक सजीव हो उठते हैं।
  • सहज, मुहावरेदार भाषा: बोलचाल की हिंदी; मुहावरे भावों को जीवंत बनाते हैं।
  • उर्दू-अंग्रेज़ी के प्रचलित शब्द: उस समय के शहरी, शिक्षित परिवेश की बोली।
  • नाटकीय मोड़: डर से गर्व तक बदलती घटनाएँ पाठ को रोचक बनाती हैं।
तालिका: भाषा-शैली की पाँच विशेषताएँ — आत्म-विश्लेषण, संस्मरणात्मक चित्र, मुहावरेदार भाषा, उर्दू-अंग्रेज़ी के शब्द और नाटकीयता।
विशेषताउदाहरण (SOYL के शब्दों में)
ईमानदार आत्म-विश्लेषणअपनी हीनता और पिता के अंतर्विरोध खुलकर कहना
संस्मरणात्मक चित्रमोहल्ले, कॉलेज और चौक के सजीव दृश्य
सहज, मुहावरेदार भाषाबोलचाल की हिंदी, भावों को जीवंत बनाने वाले मुहावरे
उर्दू-अंग्रेज़ी के प्रचलित शब्दउस समय के शहरी परिवेश की बोली
नाटकीयताडर से गर्व तक के मोड़ वाली घटनाएँ

7. परीक्षा में पठित गद्यांश और शब्दार्थ

बोर्ड परीक्षा में पाठ्यपुस्तक से एक गद्यांश देकर पाँच बहुविकल्पी प्रश्न पूछे जाते हैं। SOYL अपनी सामग्री में पाठ के अंश नहीं छापता; अभ्यास के लिए SOYL की टिप्पणियाँ (किसी प्रसंग या व्यक्ति की व्याख्या) दी गई हैं, जिन पर वैसे ही प्रश्न हैं।

असली तैयारी: क्षितिज भाग 2 में पूरा पाठ पढ़िए; हर व्यक्ति का लेखिका पर प्रभाव लिखिए; दोनों घटनाओं की शुरुआत, मोड़ और परिणाम याद रखिए; और नीचे दिए शब्दों के अर्थ समझिए।

केवल एक-एक शब्द दिया गया है; वाक्य अपनी पाठ्यपुस्तक में पढ़ें।
शब्दअर्थ
आत्मकथ्यअपने जीवन के चुने हुए प्रसंगों का वर्णन
भटियारखानाभट्टी वाला स्थान; पिता के अनुसार प्रतिभा व्यर्थ करने की जगह
विषयवारविषयों के अनुसार बँटा हुआ
प्राध्यापिकाकॉलेज में पढ़ाने वाली शिक्षिका
अंतर्विरोधएक ही व्यक्ति के भीतर परस्पर विरोधी विचार या इच्छाएँ
लोक-लाजसमाज में बदनामी का डर
हीनतास्वयं को दूसरों से कम समझने का भाव

मुख्य शब्द

भटियारखाना

भट्टी वाला स्थान; पिता के अनुसार प्रतिभा व्यर्थ करने की जगह

विषयवार

विषयों के अनुसार बँटा हुआ

प्राध्यापिका

कॉलेज में पढ़ाने वाली शिक्षिका

हीनता

स्वयं को दूसरों से कम समझने का भाव

परीक्षा सुझाव

खंड ग, क्षितिज गद्य — 11 अंक: पठित गद्यांश पर 5 बहुविकल्पी प्रश्न (5 × 1) और गद्य पाठों पर 4 में से 3 प्रश्न (25–30 शब्द, 3 × 2)।

अंक कैसे मिलते हैं (2 अंक): तथ्य/घटना (1) + उसका अर्थ या प्रभाव, अपने शब्दों में (1)।

आम गलतियाँ

  1. जन्म-स्थान अजमेर लिखना — जन्म भानपुरा (मंदसौर) में हुआ; अजमेर में बचपन और पढ़ाई।
  2. शीला अग्रवाल को प्रिंसिपल लिखना — वे हिंदी की प्राध्यापिका थीं।
  3. माँ को लेखिका का आदर्श बताना — लेखिका ने उनका त्याग आदर्श नहीं माना।
  4. पिता को केवल क्रोधी कहना — वे प्रगतिशील भी थे; उनका अंतर्विरोध लिखें।
  5. डॉ. अंबालाल को शिकायत करने वाला बताना — उन्होंने प्रशंसा की थी; शिकायत एक पुराने विचारों वाले परिचित ने की।
  6. पाठ के वाक्य रटकर लिखना — घटनाएँ अपने शब्दों में लिखें।