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नौबतखाने में इबादत — यतींद्र मिश्र: नोट्स

7 sections 6 min readBeta

1. लेखक-परिचय: यतींद्र मिश्र

ध्यान दें: मूल पाठ अपनी पाठ्यपुस्तक क्षितिज भाग 2 (NCERT) में अवश्य पढ़ें। यहाँ केवल SOYL की व्याख्या है, पाठ नहीं।

यतींद्र मिश्र का जन्म सन् 1977 में अयोध्या (उत्तर प्रदेश) में हुआ। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए. किया। वे कवि, संपादक और संगीत तथा कलाओं के गहरे जानकार हैं।

  • काव्य-संग्रह: यदा-कदा, अयोध्या तथा अन्य कविताएँ, ड्योढ़ी पर आलाप;
  • संगीत पर: गिरिजा (शास्त्रीय गायिका गिरिजा देवी के जीवन और संगीत पर)।

संगीत में उनकी रुचि ही इस पाठ की संवेदना का आधार है।

तालिका: यतींद्र मिश्र — जन्म उन्नीस सौ सतहत्तर में अयोध्या में, लखनऊ विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए., तीन काव्य-संग्रह, गिरिजा देवी पर पुस्तक गिरिजा और संगीत तथा कलाओं में रुचि।
बिंदुजानकारी
जन्मसन् 1977, अयोध्या (उत्तर प्रदेश)
शिक्षालखनऊ विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए.
काव्य-संग्रहयदा-कदा, अयोध्या तथा अन्य कविताएँ, ड्योढ़ी पर आलाप
संगीत पर लेखनगिरिजा (शास्त्रीय गायिका गिरिजा देवी पर)
रुचिशास्त्रीय संगीत और कलाएँ; साहित्यिक पत्रिका का संपादन

मुख्य शब्द

व्यक्ति-चित्र

गद्य की वह विधा जिसमें प्रसंगों के सहारे किसी व्यक्ति का व्यक्तित्व उभारा जाता है।

उस्ताद

संगीत के प्रतिष्ठित गुरु या कलाकार के लिए आदरसूचक शब्द।

2. विधा, शीर्षक और प्रसंग

यह पाठ व्यक्ति-चित्र है: केंद्र में शहनाई-वादक भारतरत्न उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ (1916–2006) हैं, जिनका बचपन का नाम अमीरुद्दीन था।

शीर्षक: नौबतखाना मंदिर या महल के प्रवेश-द्वार के ऊपर का वह स्थान है जहाँ मंगलवाद्य बजते हैं; इबादत का अर्थ है उपासना। काशी के बालाजी मंदिर के नौबतखाने में शहनाई बजाना ही बिस्मिल्ला खाँ की उपासना थी — इसलिए शीर्षक पूरे पाठ का सार है।

तालिका: पाठ की विधा व्यक्ति-चित्र, केंद्र में बिस्मिल्ला खाँ, नौबतखाना और इबादत का अर्थ, और शीर्षक का भाव कि शहनाई बजाना ही उनकी उपासना था।
बिंदुइस पाठ में
विधाव्यक्ति-चित्र: प्रसंगों के सहारे एक व्यक्ति का पूरा व्यक्तित्व
केंद्रशहनाई-वादक भारतरत्न उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ (1916–2006)
नौबतखानामंदिर या महल के प्रवेश-द्वार के ऊपर मंगलवाद्य बजाने का स्थान
इबादतउपासना, पूजा
शीर्षक का भावबालाजी मंदिर के नौबतखाने में शहनाई बजाना ही उनकी उपासना था

3. पाठ का सार (प्रसंगों के क्रम से, SOYL के शब्दों में)

(क) डुमराँव और रीड. डुमराँव (बिहार) अमीरुद्दीन का जन्म-स्थान था और उनके घर में संगीत की परंपरा थी; पाँच-छह वर्ष की उम्र में वे काशी के ननिहाल आ गए। डुमराँव में सोन के तट पर नरकट नामक घास उगती है; उसी से शहनाई की रीड बनती है।

(ख) शहनाई का परिचय. शहनाई सुषिर-वाद्य है; फूँककर बजने वाले वाद्यों में उसे शाहेनय यानी बादशाह जैसा स्थान मिला। वह विवाह, पूजा जैसे मांगलिक अवसरों का वाद्य है।

(ग) रियाज़ और पहली प्रेरणा. मामा सादिक हुसैन और अलीबख्श तथा नाना शहनाई-वादक थे। चौदह की उम्र में अमीरुद्दीन बालाजी मंदिर के नौबतखाने में रियाज़ के लिए जाते; रास्ते में रसूलनबाई और बतूलनबाई के घर से ठुमरी, टप्पा, दादरा सुनाई देते। उन्होंने स्वीकार किया कि संगीत से आरंभिक लगाव इन्हीं से जागा।

(घ) सच्चे सुर की प्रार्थना. लगभग अस्सी वर्षों तक वे ईश्वर से केवल सच्चा सुर माँगते रहे।

(ङ) मुहर्रम. दस दिन परिवार में शहनाई और संगीत-कार्यक्रम बंद रहते; आठवीं तारीख को वे पैदल चलकर शहनाई पर नौहा की धुन छेड़ते।

(च) बचपन की यादें. नाना की "मीठी" शहनाई की खोज, सुलोचना की फ़िल्मों का शौक, कुलसुम की कचौड़ी तलने की आवाज़ में सुरों का उतार-चढ़ाव।

(छ) काशी. संकटमोचन मंदिर की संगीत-सभा, विश्वनाथ और बालाजी के प्रति श्रद्धा, काशी न छोड़ने का निश्चय।

(ज) सादगी और बदलती काशी. फटी लुंगी पर शिष्या का टोकना और उनका हँसकर समझाना; अंतिम वर्षों में लुप्त होती परंपराओं का दुख। 21 अगस्त 2006 को नब्बे वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ।

यह SOYL का सार है, पाठ का अनुवाद नहीं। मूल पाठ अपनी पाठ्यपुस्तक में पढ़ें।

तालिका: शहनाई — सुषिर-वाद्य, नरकट से बनी रीड, शाहेनय की उपाधि, मांगलिक अवसरों पर उपयोग, और दक्षिण भारत में नागस्वरम् जैसा समान वाद्य।
शहनाई के बारे मेंजानकारी (SOYL के शब्दों में)
वाद्य का प्रकारसुषिर-वाद्य, यानी फूँककर बजने वाला
रीडभीतर से खोखली, नरकट घास से बनी; इसी से फूँक जाती है
शाहेनयफूँककर बजने वाले वाद्यों में बादशाह जैसा स्थान
उपयोगविवाह, पूजा जैसे मांगलिक अवसर; अवधी लोकगीतों और चैती में उल्लेख
दक्षिण में समान वाद्यनागस्वरम्

4. पात्र-चित्रण: बिस्मिल्ला खाँ

विशेषताएँ (हर एक के साथ पाठ का प्रसंग):

  1. विनम्र साधक — लगभग अस्सी वर्षों तक केवल सच्चा सुर माँगना।
  2. धार्मिक उदारता — मुहर्रम में शोक-धुन; बालाजी मंदिर में रियाज़, संकटमोचन की सभा।
  3. सादगी — भारतरत्न के बाद भी फटी लुंगी; दिखावे से अधिक साधना।
  4. कृतज्ञता — रसूलनबाई और बतूलनबाई को आरंभिक प्रेरणा का श्रेय।
  5. ज़िंदादिली — फ़िल्मों और कचौड़ी के शौक को हँसकर याद करना।
  6. काशी-प्रेम और परंपरा-प्रेम — काशी न छोड़ना; लुप्त होती परंपराओं का दुख।

अन्य पात्र: मामा सादिक हुसैन और अलीबख्श (शहनाई-वादक), बड़े भाई शम्सुद्दीन, गायिका बहनें रसूलनबाई और बतूलनबाई, कुलसुम हलवाइन।

तालिका: बिस्मिल्ला खाँ की छह विशेषताएँ और उनके प्रसंग — विनम्रता, धार्मिक उदारता, सादगी, कृतज्ञता, ज़िंदादिली और परंपरा-प्रेम।
विशेषताप्रसंग (SOYL के शब्दों में)
विनम्र साधकलगभग अस्सी वर्षों तक केवल सच्चा सुर माँगना
धार्मिक उदारतामुहर्रम में शोक-धुन; मंदिरों में शहनाई
सादगीभारतरत्न के बाद भी फटी लुंगी में रहना
कृतज्ञतागायिका बहनों को आरंभिक प्रेरणा का श्रेय
ज़िंदादिलीफ़िल्मों और कचौड़ी के शौक को हँसकर याद करना
परंपरा-प्रेमलुप्त होती परंपराओं पर दुख

5. मूल भाव और संदेश

  • कला-साधना उपासना है: सच्चा कलाकार जीवन भर सीखता है; बिस्मिल्ला खाँ के लिए संगीत इबादत था।
  • साझी संस्कृति: अपने धर्म के प्रति निष्ठा और दूसरी आस्थाओं का आदर साथ-साथ चल सकते हैं; बिस्मिल्ला खाँ काशी की साझी (गंगा-जमुनी) संस्कृति के प्रतीक थे।
  • सादगी और विनम्रता: सम्मान से बढ़कर साधना।
  • परंपरा का मूल्य: रियाज़, संगतकार का सम्मान और स्थानीय संस्कृति को बचाने की आवश्यकता।
तालिका: बिस्मिल्ला खाँ का काशी से जुड़ाव — मंदिर में रियाज़, संकटमोचन की सभा, विश्वनाथ की दिशा में श्रद्धा, काशी न छोड़ना और साझी संस्कृति।
काशी से जुड़ावपाठ का प्रसंग (SOYL के शब्दों में)
मंदिर में रियाज़चौदह की उम्र से बालाजी मंदिर के नौबतखाने में अभ्यास
संकटमोचन की सभाहनुमान जयंती पर पाँच दिनों की संगीत-सभा में अवश्य भागीदारी
दिशा की श्रद्धाकाशी से बाहर विश्वनाथ और बालाजी के मंदिरों की ओर उन्मुख होकर बैठना
काशी न छोड़नागंगा, मंदिर, पुरखों की परंपरा और अपनी शिक्षा — सब यहीं
साझी संस्कृतिअपने धर्म में निष्ठा और दूसरी आस्थाओं का आदर, साथ-साथ

6. भाषा-शैली

  • विधा: व्यक्ति-चित्र; छोटे-छोटे प्रसंगों से व्यक्तित्व का निर्माण।
  • शब्दावली: हिंदी के साथ उर्दू शब्द (रियाज़, इबादत, तहज़ीब) और संगीत की शब्दावली (ठुमरी, टप्पा, दादरा, सम, आरोह-अवरोह, सुषिर-वाद्य)।
  • वर्णन-पद्धति: पुराने प्रसंगों का वर्तमान काल में वर्णन — दृश्य सामने घटता-सा लगता है; चित्रात्मकता।
  • स्वर: श्रद्धा के साथ हल्का हास्य (डुमराँव और रीड का जोड़, मीठी शहनाई की खोज)।
  • संवाद: पात्रों की बातें बोलचाल की काशी वाली भाषा में आती हैं, जिससे पाठ जीवंत बनता है।
तालिका: भाषा-शैली के पाँच पक्ष — व्यक्ति-चित्र, हिंदी-उर्दू और संगीत की शब्दावली, वर्तमान काल में चित्रात्मक वर्णन, श्रद्धा और हास्य का स्वर, और छोटे प्रसंगों की संरचना।
पक्षविशेषता
विधाव्यक्ति-चित्र
शब्दावलीहिंदी के साथ उर्दू (रियाज़, इबादत, तहज़ीब) और संगीत के शब्द (ठुमरी, टप्पा, दादरा, सम, आरोह-अवरोह)
वर्णन-पद्धतिपुराने प्रसंगों का वर्तमान काल में वर्णन; चित्रात्मकता
स्वरश्रद्धा के साथ हल्का हास्य
संरचनाछोटे-छोटे प्रसंग, बचपन से वृद्धावस्था तक

7. परीक्षा में पठित गद्यांश और शब्दार्थ

बोर्ड परीक्षा में पाठ्यपुस्तक से एक गद्यांश देकर पाँच बहुविकल्पी प्रश्न पूछे जाते हैं। SOYL अपनी सामग्री में पाठ के वाक्य नहीं छापता; अभ्यास के लिए SOYL की टिप्पणियाँ (पाठ के किसी प्रसंग की व्याख्या) दी गई हैं, जिन पर वैसे ही प्रश्न हैं।

असली तैयारी: क्षितिज भाग 2 में पाठ कई बार पढ़िए; प्रसंगों का क्रम याद कीजिए; हर प्रसंग से झलकने वाला गुण पहचानिए; नीचे दिए शब्दों के अर्थ याद कीजिए।

केवल एक-एक शब्द दिया गया है; पाठ अपनी पाठ्यपुस्तक में पढ़ें।
शब्दअर्थ
नौबतखानाप्रवेश-द्वार के ऊपर मंगलवाद्य बजाने का स्थान
इबादतउपासना
रियाज़संगीत का नियमित अभ्यास
रीडशहनाई का वह भाग जिसमें फूँक भरकर उसे बजाया जाता है
नरकटएक घास, जिससे रीड बनती है
सुषिर-वाद्यफूँककर बजने वाले वाद्य
नौहाशोक-गीत या शोक-धुन
समताल का वह बिंदु जहाँ लय का चक्र पूरा होता है
आरोह-अवरोहसुरों का चढ़ाव-उतार

मुख्य शब्द

नौबतखाना

प्रवेश-द्वार के ऊपर मंगलवाद्य बजाने का स्थान

इबादत

उपासना

रियाज़

नियमित अभ्यास

रीड

शहनाई का फूँकने वाला भाग

नरकट

रीड बनाने की घास

सुषिर-वाद्य

फूँककर बजने वाले वाद्य

नौहा

शोक-धुन

सम

ताल का पूरा होने वाला बिंदु

आरोह-अवरोह

सुरों का चढ़ाव-उतार

परीक्षा सुझाव

खंड ग, क्षितिज गद्य — 11 अंक: पठित गद्यांश पर 5 बहुविकल्पी प्रश्न (5 × 1) और गद्य पाठों पर 4 में से 3 प्रश्न (25–30 शब्द, 3 × 2)।

अंक कैसे मिलते हैं (2 अंक): बात या गुण (1) + पाठ का प्रसंग, अपने शब्दों में (1)।

आम गलतियाँ

  1. जन्म-स्थान काशी लिखना — जन्म डुमराँव में हुआ; काशी ननिहाल था।
  2. रीड को पूरा वाद्य समझना — रीड शहनाई का फूँकने वाला भाग है, जो नरकट घास से बनता है।
  3. संकटमोचन की संगीत-सभा को मुहर्रम से जोड़ना — वह हनुमान जयंती पर होती थी।
  4. मुहर्रम के आठवें दिन राग बजाना लिखना — उस दिन केवल शोक-धुन (नौहा) बजती थी।
  5. बिस्मिल्ला खाँ को किसी एक धर्म तक सीमित बताना — वे साझी संस्कृति के प्रतीक थे।
  6. पाठ के वाक्य रटकर गलत लिखना — प्रसंग और उसका अर्थ अपने शब्दों में लिखना पर्याप्त है।