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माता का अँचल — शिवपूजन सहाय: नोट्स

7 sections 7 min readBeta

1. लेखक-परिचय: शिवपूजन सहाय

ध्यान दें: मूल पाठ अपनी पाठ्यपुस्तक कृतिका भाग 2 (NCERT) में अवश्य पढ़ें। यहाँ केवल SOYL की व्याख्या है, पाठ नहीं।

शिवपूजन सहाय (1893–1963) बिहार के उनवाँस में जन्मे। वे गद्यकार होने के साथ-साथ हिंदी पत्रकारिता के प्रमुख संपादक रहे।

  • पाठ का स्रोत: उपन्यास देहाती दुनिया;
  • अन्य रचनाएँ: वे दिन वे लोग, स्मृतिशेष;
  • संपादन: मतवाला, माधुरी, जागरण, बालक, हिमालय, गंगा जैसी पत्रिकाएँ।

उनके लेखन में गाँव का जीवन, वहाँ की बोली और लोक-रंग सहज रूप से आते हैं।

तालिका: शिवपूजन सहाय — जीवन-काल अठारह सौ तिरानवे से उन्नीस सौ तिरसठ, जन्म बिहार के उनवाँस में, पाठ देहाती दुनिया उपन्यास का अंश, अन्य रचनाएँ, पत्रिकाओं का संपादन और ग्रामीण जीवन के गद्यकार की पहचान।
बिंदुजानकारी
जीवन-कालसन् 1893 – 1963
जन्म-स्थानउनवाँस (बिहार)
पाठ का स्रोतउपन्यास देहाती दुनिया का अंश
अन्य रचनाएँवे दिन वे लोग, स्मृतिशेष
संपादनमतवाला, माधुरी, जागरण, बालक, हिमालय, गंगा जैसी पत्रिकाएँ
पहचानगाँव के जीवन और लोकभाषा के रंग वाले गद्यकार

मुख्य शब्द

उपन्यास-अंश

किसी उपन्यास से लिया गया एक हिस्सा, जो अपने-आप में पूरा प्रसंग कहता है।

देशज शब्द

किसी क्षेत्र की बोली से आए स्थानीय शब्द।

2. विधा और प्रसंग

माता का अँचल कृतिका भाग 2 का पाठ है, जो उपन्यास देहाती दुनिया का अंश है। बालक भोलानाथ स्वयं "हम" कहकर अपनी कथा सुनाता है, इसलिए इसका ढंग आत्मकथात्मक है।

परिवेश बिहार का एक पुराना गाँव है — घर, चबूतरा, गंगा, खेत और पाठशाला। पाठ में बचपन की मस्ती, पिता का खेल-भरा दुलार, माँ की ममता और अंत में संकट के समय माँ की गोद की शरण का चित्र है।

बोर्ड में: कृतिका से 8 अंक — तीन में से दो प्रश्न, 50–60 शब्द, 4-4 अंक।

तालिका: पाठ के तत्व — बिहार का गाँव, वाचक बालक भोलानाथ, मुख्य पात्र भोलानाथ, बाबूजी और मइयाँ, अन्य पात्र, विधा उपन्यास-अंश और चरम प्रसंग माँ के आँचल में शरण।
रचना का तत्व"माता का अँचल" में
परिवेशबिहार का एक पुराना गाँव — घर, चबूतरा, गंगा, खेत, पाठशाला
वाचकबालक भोलानाथ ("हम" कहकर अपनी कथा)
मुख्य पात्रभोलानाथ, बाबूजी, मइयाँ
अन्य पात्रसाथियों की टोली, मूसन तिवारी, गुरुजी
विधाउपन्यास-अंश, आत्मकथात्मक ढंग
चरम प्रसंगसाँप से डरकर माँ के आँचल में शरण

3. पाठ का सार (घटना-क्रम से, SOYL के शब्दों में)

(क) पिता के साथ दिन. भोलानाथ पिता के पास सोता, उन्हीं के साथ जागता और पूजा पर बैठता है। माथे पर भभूत लगवाने की ज़िद करता है; पिता उसे भोलानाथ पुकारते हैं (असली नाम तारकेश्वरनाथ)। पूजा के बाद पिता राम-नाम लिखी पर्चियाँ आटे की गोलियों के भीतर रखकर गंगा की मछलियों को खिलाते हैं; बालक कंधे पर सवार रहता है और लौटते समय पेड़ की डाल पर झूलता है।

(ख) दुलार और भोजन. पिता कुश्ती में जान-बूझकर हार जाते हैं और अपने हाथ से थोड़ा-थोड़ा खिलाते हैं। माँ मानती है कि इससे पेट नहीं भरता; वह निवालों को पक्षियों के नाम देकर भरपेट खिलाती है, फिर बालों में तेल डालकर, चोटी बनाकर, रंगीन कपड़े पहनाकर सजा देती है। बालक रोता है, पर साथियों को देखते ही चुप।

(ग) टोली के खेल. चबूतरे पर मिठाई की दुकान, घरौंदा और दावत, बारात और खेती के खेल — सब बेकार चीज़ों से। पिता कभी ग्राहक बनते, कभी दावत में आकर बैठ जाते; बच्चे खिलखिलाकर भाग खड़े होते।

(घ) शरारत और दंड. टोली गाँव के बुज़ुर्ग मूसन तिवारी को चिढ़ाती है। उनकी शिकायत पर गुरुजी भोलानाथ को दंड देते हैं; पिता विनती करके उसे घर ले आते हैं।

(ङ) साँप और शरण. चूहे के बिल को पानी से भरने पर साँप निकलता है; भगदड़ में बच्चे घायल होते हैं। घर पहुँचकर भोलानाथ पिता की पुकार अनसुनी कर माँ से लिपट जाता है। माँ घबराकर रोती है और घावों पर हल्दी लगाती है; बालक पिता के बुलाने पर भी माँ का आँचल नहीं छोड़ता।

यह SOYL का सार है, पाठ का अंश नहीं। मूल पाठ अपनी पाठ्यपुस्तक में पढ़ें।

तालिका: बच्चों के चार खेल — मिठाई की दुकान, घरौंदा और दावत, बारात और खेती — उनकी बिना ख़र्च की सामग्री और वे बड़ों के किस काम की नकल हैं।
खेलसामग्री (SOYL के शब्दों में)किसकी नकल
मिठाई की दुकानमिट्टी की मिठाइयाँ, टूटे बर्तनों के पैसेव्यापार
घरौंदा और दावतधूल, तिनके, पुरानी डिबियाँगृहस्थी
बारातटीन के डिब्बे का बाजा, टूटी चीज़ों की पालकीविवाह
खेतीचबूतरे का खेत, बच्चे बने बैलकिसानी

4. पात्र-चित्रण

भोलानाथ: चंचल और खेल-प्रिय (टोली के खेल); नटखट (मूसन तिवारी को चिढ़ाना, बिल को पानी से भरना); पिता से गहरा लगाव (दिन भर साथ, कंधे की सवारी); पर संकट में माँ की शरण — बाल-मन का सहज स्वभाव।

बाबूजी: धार्मिक (पूजा, राम-नाम, मछलियों को आटा); अत्यंत स्नेही (कुश्ती में हारना, झूला झुलाना); विनोदी, बच्चों के साथ बच्चे (दावत में बैठना, दुकान के ग्राहक); क्षमाशील (गुरुजी से विनती)।

मइयाँ: ममतामयी; भरपेट खिलाने की चिंता (पक्षियों के नाम वाले निवाले); सँवारने-सजाने में आनंद; संकट में घबराहट के साथ तुरंत देखभाल (हल्दी)।

अन्य: साथियों की टोली (मस्ती का केंद्र), मूसन तिवारी (शिकायत करने वाले बूढ़े), गुरुजी (दंड देने वाले)।

तालिका: पिता-पुत्र संबंध के पाँच प्रसंग — साथ सोना और पूजा, कंधे पर गंगा-यात्रा, कुश्ती में हारना, खेलों में शामिल होना और गुरुजी से विनती।
प्रसंगपिता-पुत्र संबंध की झलक
साथ सोना-जागना, पूजादिन भर का साथ
कंधे पर गंगा-यात्रा, डाल पर झूलाखेल-भरा दुलार
कुश्ती में जान-बूझकर हारनाबच्चे का उत्साह बढ़ाना
दावत और बारात में शामिल होनाबच्चों के साथ बच्चा बन जाना
गुरुजी से विनतीक्षमा और रक्षा

मुख्य शब्द

वात्सल्य

संतान के प्रति माता-पिता का स्नेह।

बाल-मनोविज्ञान

बच्चों के मन, स्वभाव और व्यवहार की समझ।

5. मूल भाव और संदेश

  • वात्सल्य के दो रूप: पिता का दुलार साथ और खेल में; माँ की ममता पोषण और सुरक्षा में।
  • बाल-मन: बच्चे का दुख क्षणिक है (साथियों को देखते ही चुप), पर डर के क्षण में वह सबसे गहरी सुरक्षा — माँ — की ओर भागता है।
  • ग्रामीण बचपन: बिना ख़र्च के, टोली में, कल्पना भरे खेल; बड़ों के संसार की नकल।
  • शीर्षक: पाठ में पिता अधिक, पर अंत का मर्म माँ का आँचल — इसलिए "माता का अँचल" सार्थक।
  • आज के लिए संदेश: बच्चों के साथ समय बिताएँ, उनके खेलों में शामिल हों; और याद रखें कि संकट में बच्चे को सबसे पहले भावनात्मक सुरक्षा चाहिए।

6. भाषा-शैली

  • आत्मकथात्मक शैली: बालक "हम" कहकर अपनी यादें सुनाता है।
  • चित्रात्मकता: खेलों की सामग्री और साँप वाली भगदड़ के दृश्य आँखों के सामने खिंच जाते हैं।
  • देशज शब्दावली: मइयाँ, अमनिया, चिरौरी, भभूत — भोजपुरी क्षेत्र का रंग।
  • तुकबंदियाँ: खेलते बच्चों के लोक-गीत जैसे बोल (पाठ्यपुस्तक में पढ़ें)।
  • हास्य और वात्सल्य: दावत में बैठे पिता और हँसकर भागते बच्चे।
  • सरल, सहज वाक्य — बच्चे की नज़र से देखा गया संसार।
तालिका: भाषा-शैली की पाँच विशेषताएँ — आत्मकथात्मक शैली, चित्रात्मकता, देशज शब्द, तुकबंदियाँ और हास्य के साथ वात्सल्य।
विशेषताउदाहरण (SOYL के शब्दों में)
आत्मकथात्मक शैलीबालक "हम" कहकर अपनी यादें सुनाता है
चित्रात्मकताखेलों और भगदड़ के दृश्य आँखों के सामने
देशज शब्दमइयाँ, अमनिया, चिरौरी, भभूत
तुकबंदियाँखेलते बच्चों के लोक-गीत जैसे बोल
हास्य और वात्सल्यदावत में बैठे पिता, हँसकर भागते बच्चे

7. कृतिका के प्रश्न और शब्दार्थ

कृतिका से बोर्ड में तीन में से दो प्रश्न आते हैं, हर एक 4 अंक का, 50–60 शब्दों में। SOYL अपनी सामग्री में पाठ के अंश नहीं छापता; अभ्यास के लिए SOYL की टिप्पणियाँ (किसी प्रसंग की व्याख्या) दी गई हैं, जिन पर बहुविकल्पी प्रश्न हैं, और पचास-साठ शब्दों वाले प्रश्नों का अलग अभ्यास है।

उत्तर का ढाँचा (4 अंक): घटना → भाव या कारण → पाठ का प्रमाण → निष्कर्ष।

असली तैयारी: कृतिका भाग 2 में पूरा पाठ पढ़िए; पिता और माँ के स्नेह के प्रसंग अलग-अलग सूची में लिखिए; अंतिम प्रसंग और शीर्षक का संबंध याद रखिए; और नीचे दिए शब्दों के अर्थ समझिए।

केवल एक-एक शब्द दिया गया है; वाक्य अपनी पाठ्यपुस्तक में पढ़ें।
शब्दअर्थ
भभूतराख, भस्म
त्रिपुंडमाथे पर लगाई जाने वाली तीन आड़ी रेखाएँ
मइयाँमाँ
साननामिलाकर एक करना
घरौंदाबच्चों का बनाया छोटा खेल-घर
चिरौरीविनती, अनुनय
अमनिया करनाअनाज साफ़ करना, चुनना
शरणआश्रय, सुरक्षित ठिकाना

मुख्य शब्द

भभूत

राख, भस्म

त्रिपुंड

माथे की तीन आड़ी रेखाएँ

मइयाँ

माँ

सानना

मिलाकर एक करना

घरौंदा

बच्चों का खेल-घर

चिरौरी

विनती

अमनिया करना

अनाज साफ़ करना

शरण

आश्रय

परीक्षा सुझाव

खंड ग, कृतिका भाग 2 — 8 अंक: तीन में से दो प्रश्न, 50–60 शब्द, 4-4 अंक।

अंक कैसे मिलते हैं (4 अंक): घटना (1) + भाव या कारण (1) + पाठ का प्रमाण (1) + निष्कर्ष और भाषा (1)।

आम गलतियाँ

  1. यह लिखना कि साँप से डरकर भोलानाथ पिता के पास गया — वह सीधे माँ के पास गया।
  2. मइयाँ को कठोर बताना — तेल-चोटी की सख़्ती भी उसकी ममता है।
  3. शीर्षक के प्रश्न में केवल अंतिम प्रसंग लिखना और पाठ में पिता की प्रमुखता वाला विरोधाभास छोड़ देना।
  4. भोलानाथ को असली नाम समझना — असली नाम तारकेश्वरनाथ है।
  5. बच्चों की तुकबंदियाँ या पाठ के वाक्य रटकर लिखना — भाव अपने शब्दों में लिखें।
  6. शब्द-सीमा भूलना — कृतिका के उत्तर पचास-साठ शब्दों में।